श्री गुरु जी

माधवराव सदाशिव राव गोलवलकर "श्री गुरु जी"


माधव सदाशिव गोलवलकर का जन्म 19 फरवरी 1906 को नागपुर के पास रामटेक में हुआ था। वे अपने माता-पिता की चौथी संतान थे। उनके पिता का नाम श्री सदाशिव राव उपाख्य 'भाऊ जी' तथा माता का श्रीमती लक्ष्मीबाई उपाख्य 'ताई' था। उनका बचपन में नाम माधव रखा गया पर परिवार में वे मधु के नाम से ही पुकारे जाते थे। पिता सदाशिव राव प्रारम्भ में डाक-तार विभाग में कार्यरत थे परन्तु बाद में उनकी नियुक्ति शिक्षा विभाग में 1908 में अध्यापक पद पर हो गयी। वह नौ बच्चों में से एकमात्र जीवित पुत्र थे।

गुरू जी में कुशाग्र बुद्धि, ज्ञान की लालसा, असामान्य स्मरण शक्ति जैसे गुण बचपन से ही विकसित थे। सन् 1919 में उन्होंने 'हाई स्कूल की प्रवेश परीक्षा' में विशेष योग्यता दिखाकर छात्रवृत्ति प्राप्त की। सन् 1922 में 16 वर्ष की आयु में माधव ने मैट्रिक की परीक्षा चाँदा के 'जुबली हाई स्कूल' से उत्तीर्ण की। तत्पश्चात् सन् 1924 में उन्होंने नागपुर के 'हिस्लाप कॉलेज' से विज्ञान विषय में इण्टरमीडिएट की परीक्षा विशेष योग्यता के साथ उत्तीर्ण की। अंग्रेजी विषय में उन्हें प्रथम पारितोषिक मिला। वे भरपूर हाकी तो खेलते ही थे कभी-कभी टेनिस भी खेल लिया करते थे। इसके अतिरिक्त व्यायाम का भी उन्हें शौक था। मलखम्ब के करतब, पकड़ एवं कूद आदि में वे काफी निपुण थे। विद्यार्थी जीवन में ही उन्होंने बाँसुरी एवं सितार वादन में भी अच्छी प्रवीणता हासिल कर ली थी।

1927 में गोलवलकर ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से एमएससी की डिग्री हासिल की थी। वह राष्ट्रवादी नेता और विश्वविद्यालय के संस्थापक मदन मोहन मालवीय से बहुत प्रभावित थे। बाद में उन्होंने बीएचयू में ‘जंतु शास्र’ पढ़ाया, जहां उन्होंने उपनाम ‘गुरुजी’ कमाया।

अपने विद्यार्थी जीवन में भी माधव राव अपने मित्रों के अध्ययन में उनका मार्गदर्शन किया करते थे और अब तो अध्यापन उनकी आजीविका का साधन ही बन गया था। उनके अध्यापन का विषय प्राणि-विज्ञान था, विश्वविद्यालय प्रशासन ने उनकी प्रतिभा पहचान कर उन्हें बी.ए. की कक्षा के छात्रों को अंग्रेजी और राजनीति शास्त्र भी पढ़ाने का अवसर दिया। अध्यापक के नाते माधव राव अपनी विलक्षण प्रतिभा और योग्यता से छात्रों में इतने अधिक अत्यन्त लोकप्रिय हो गये कि उनके छात्र उनको "गुरुजी" के नाम से सम्बोधित करने लगे। इसी नाम से वे आगे चलकर जीवन भर जाने गये। माधव राव अपने छात्रों तथा मित्रों को अंग्रेजी, अर्थशास्त्र, गणित तथा दर्शन जैसे अन्य विषय भी पढ़ाने को सदैव तत्पर रहते। यदि उन्हें पुस्तकालय में पुस्तकें नहीं मिलती थीं, तो वे उन्हें खरीद कर और पढ़कर छात्रों एवं मित्रों की सहायता करते रहते थे। उनके वेतन का बहुतांश अपने होनहार छात्र-मित्रों की फीस भर देने अथवा उनकी पुस्तकें खरीद देने में ही व्यय हो जाया करता था।

नागपुर के स्वयंसेवक "भैयाजी दाणी" के द्वारा श्री गुरूजी संघ के सम्पर्क में आये और उस शाखा के संघचालक भी बने।

समर्पण भाव और प्रबल आत्मसंयम होने के कारण से 1939 में माधव सदाशिव गोलवलकर को संघ का सरकार्यवाह नियुक्त किया गया। 1940 में उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सरसंघचालक बनाया गया।

 सरसंघचालक का दायित्व निर्वहन करते हुए उन्होंने संघ को वटवृक्ष का रूप प्रदान किया कई  विविध संगठनों के लिए उन्होंने समझदार एवं नेतृत्व करने वाले गुना से भरपूर कार्यकर्ताओं को नियुक्त किया। जिसके कारण से संगठनों का विस्तार होने लगा। श्री गुरु जी ने सरसंघचालक का दायित्व 33 वर्ष तक निर्वाह किया । कहा जाता है कि गुरु जी ने 33 वर्षों में पूरे भारतवर्ष का 66 बार प्रवास किया अर्थात वर्ष में दो बार संपूर्ण भारतवर्ष में उनका प्रवास रहता था।

30 जनवरी 1948 को गांधी हत्या के मिथ्या आरोप में 4 फरवरी को संघ पर प्रतिबन्ध लगाया गया। श्री गुरूजी को गिरफ्तार किया गया। देश भर में स्वयंसेवको की गिरफ्तारियां हुई। जेल में रहते हुवे उन्होंने पत्र-पत्रिकाओं का विस्तृत व्यक्तव्य भेजा जिसमे सरकार को मुहतोड़ जवाब दिया गया था। आह्वान किया गया कि संघ पर आरोप सिद्ध करो या प्रतिबन्ध हटाओ। बाद में संघ से प्रतिबंध हट गया।

जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा, उस समय यदि वे चाहते तो शासन की खुली अवज्ञा करके अपनी शक्ति का परिचय दे सकते थे, किन्तु उन्होंने संघ के कार्य का विसर्जन करके अपनी देशभक्ति का परिचय दिया। प्रतिबंध उठने के पश्चात् स्थान-स्थान पर उनका भव्य स्वागत हुआ। दिल्ली में रामलीला मैदान पर जो सभा हुई, उसका आदि और अंत नहीं दिखता था। बड़े से बड़े संत के अहंकार को जगा देने के लिए वह दृश्य पर्याप्त था। जब श्री गुरुजी बोलने के लिए खड़े हुए तो उन्होंने कहा : ''यदि अपना दाँत जीभ काट ले तो मुक्का मारकर वह दाँत नहीं तोड़ा जाता।''


श्री  गुरूजी स्वयं अपने प्रति बहुत कठोर थे । आम तौर पर ऐसा दिखायी देता है कि  स्वयं अपने प्रति कठोर रहने वाले दूसरों के प्रति भी कठोर रहते हैं । औरों  को तकलीफ देते रहते हैं । श्री गुरूजी की विशेषता थी कि उनका स्वभाव ऐसा  नहीं था । वे दूसरों के प्रति बहुत अधिक सहृदयता से व्यवहार करते थे । स्वयं  अपने बारे में कठोर परन्तु दूसरों के बारे में उदारता, उनकी विशेषता थी ।

श्री गुरुजी कहते थे कि अपने मन को ठीक, संतुलित रखना है तो पातंजल सूत्र का अनुसरण करना चाहिये । सूत्र इस प्रकार है –

“मैत्री करूणा मुदिनो पेक्षाणाम् सुख दुःख पुण्यापुण्य विषयाणाम् भावना तश्वित प्रसादनम्’

श्री  गुरूजी कितने विद्वान थे, यह बताने की आवश्यकता नहीं है परन्तु सब लोगों के  साथ उनका व्यवहार सर्वसामान्य मनुष्य जैसा था । मानों सामान्य चार लोग  जैसे ही वे थे । सभी के बारे में उनके मन में आस्था थी । औपचारिक बैठकों या  बौद्धिक वर्गों की अपेक्षा उनके द्वारा अधिक शिक्षा  और संस्कारों की  उपलब्धि उनकी अनौपचारिक बातचीत से होती थी । सुबह-शाम चाय के समय उपस्थित  सब के साथ मुक्त गपशप चलती थी । चाय पान में कोई भी आकर बैठ सकता था । उस  समय श्री गुरूजी के साथ कोई भी बात कर सकता था । श्री गुरूजी की बैठक में कोई भी आ सकता था ।  इससे श्री गुरुजी को लोकमानस में क्या चल रहा है, इसका पता चलता था । इस  अनौपचारिक बातचीत का संगठन की दृष्टि से विशेष महत्व था । इस समय स्वाभाविक  रूप से, आपस में घुलमिल कर आत्मीयता पूर्ण बातचीत होती थी । श्री गुरूजी  के मन में हर एक की चिन्ता रहने से प्रत्येक से उनका आत्मीयता का व्यवहार  होता था ।

 एक बार श्री  गुरुजी की बैठक में आने पर सभी का डर, संकोच, समाप्त हो जाता था ।एक बार श्री गुरूजी नागपुर की गोरक्षण उपशाखा में गये थे । प्रार्थना  के पश्वात लौटते समय मोटर गाड़ी की ओर वे जा रहे थे । साथ शिशु, बाल  स्वयंसेवक भी चल रहे थे । कार के पास आकर श्री गुरुजी ने जब दरवाजा खोला तब  एक शिशु स्वयंसेवक ने पूछा, “क्यों रे, यह तेरी मोटर कार है क्या?” मजेदार  प्रश्नोत्तर प्रारंभ हुए –

“हाँ, मेरी है ।” – गुरुजी

“तू चलाता है क्या” – स्वयंसेवक

“हाँ, मैं चलाता हूँ ।” –  गुरुजी

“तुझे मोटर चलाना याद है?” – स्वयंसेवक

“याद है ।” – गुरूजी

“कमाल है तेरी!” स्वयंसेवक ने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा ।


एक शिशु  स्वयंसेवक श्री गुरुजी को प्रशस्तिपत्र देकर कह रहा है,  ‘कमाल है तेरी’  उसके मन में कितना आत्मीयता का भाव रहा होगा! श्री गुरूजी का स्वभाव,  व्यवहार, बातचीत ऐसी ही थी । संपर्क में आने पर दिल की दूरी, अलगाव, सारा  समाप्त हो जाता था ।

यह आत्मीयता ही उनकी महानता और उनके प्रति व्यापक श्रध्दा का कारण है और उनकी महानता इसमें है कि वे इस आत्मीयता को लेकर चल सके हैं। एक बार 'धर्मयुग' साप्ताहिक ने भारत के अनेक महापुरुषों के जीवन के ध्येयवाक्य छापे थे। पूजनीय श्री गुरुजी का धयेयवाक्य सबसे छोटा किन्तु समर्पक था : 'मैं नहीं, तू ही।'  इन चार शब्दों में श्री गुरुजी का संपूर्ण जीवन समाया हुआ था। यह 'तू' कौन है? संघ, समाज, ईश्वर - वे तीनों को एकरूप करके चलते थे। तीनों की सेवा में विरोध नहीं, विसंगत नहीं। 'एकहि साधो सब सधो' के अनुसार वे संघ की साधना करके सबकी साधना में लगे हुए थे। उनका जीवन ही साधना बन गया था।

अपने सार्वजनिक भाषणों में कहा कि राजनीति वेश्याओं का धर्म है। उन्होंने संघ के सदस्यों को राजनीति से दूर रहने की सलाह दी।

राष्ट्र की संकल्पना उनके अनुसार थी कि ‘राष्ट्र क्या है ? राष्ट्र के लिये मातृभूमि एवं उस भूमि के प्रति श्रद्धाभाव रखने वाले लोग आवश्यक हैं, जिन लोगों में समान परम्परा, समान आदर्श, समान भय, समान आकांक्षायें हैं, उस समाज को राष्ट्र कहते हैं। सरल शब्दों में यही हिन्दूराष्ट्र और हमारी मातृभूमि है।

श्री गुरु जी के बारे में अनेकों प्रसंग जीवन के अनुभव यहां बताई जा सकते हैं उनका संपूर्ण जीवन "राष्ट्रीय स्वाहा, इदम राष्ट्राय, इदम न मम" के आधार पर व्यतीत हुआ।


श्री गुरु जी को एक गंभीर बीमारी ने ग्रसित कर लिया जिसके कारण 5 जून 1973 को वे पंचतंत्र में विलीन हुए।

ऐसे संगठन शिल्पी और महान ऋषि के बारे में वर्णन करना बहुत ही कठिन कार्य है। फिर भी एक छोटा सा प्रयास यहां आपको पढ़ने और सुनने को मिला है मैं श्री गुरु जी को नमन करते हुए अपनी कलम को यही विश्राम देता हूं।

                         भारत माता की जय


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